वैशाली और गौरव की मोटिवेशनल कहानी | Best Family Motivational Story In Hindi

दोस्तों, यह दिल को छू लेने वाली Best Family Motivational Story In Hindi वैशाली और गौरव नाम के एक दंपति जोड़े के पारिवारिक जीवन, प्रेम और संबंधों पर आधारित हैं। यह मोटिवेशनल कहानी आपके जीवन और सोचने के नजरिए को बदल सकती हैं।

आपको यह मोटिवेशनल कहानी क्यों पढ़नी चाहिए।

आप महिला हों या पुरुष, यह ‘Family Motivational Story In Hindi‘ आपके लिए जीवन बदलने वाली कहानी साबित हो सकती है। इस कहानी में आप जान पाएंगे की कभी कभी एक छोटी सी गलती भी आपके आपसी रिश्तों में कितनी बड़ी दरार पैदा कर सकती है। सच्ची घटना आधारित इस कहानी से आपको बहुत कुछ सीखने को मिलेगा और आप अपने जीवन और संबंधों के प्रति प्रेरित होंगे।

Best Family Motivational Story In Hindi

Family Motivational Story In Hindi

वैशाली और गौरव की मोटिवेशनल कहानी

वैशाली और गौरव के तलाक के पेपर आज मिल गए थे, दोनों साथ में कोर्ट से निकले। दोनों के परिवार एक साथ थे और उनके चेहरों पर जीत और शांति के निशान साफ ​​नजर आ रहे थे।  चार साल की लंबी लड़ाई के बाद आज फैसला लिया गया। उनकी शादी को दस साल हो चुके थे, लेकिन वे केवल छह साल ही साथ रह पाए थे। तलाक की कार्यवाही में चार साल लग गए।

वैशाली के हाथ में दहेज के सामान की एक सूची थी जो अभी गौरव के घर से ले जाना बाकी था और गौरव के पास वैशाली से लिए जाने वाले गहनों की सूची थी। इसके साथ ही कोर्ट का यह भी आदेश था कि गौरव वैशाली को एकमुश्त 12 लाख रुपये का भुगतान करेगा। 

वैशाली और गौरव दोनों एक ही टैक्सी में बैठकर गौरव के घर पहुंचे। वैशाली को दहेज में दी गई वस्तुओं की पहचान करनी थी। इसीलिए चार साल बाद वह अपने ससुराल जा रही थी, बस आखिरी बार और उसके बाद उसे फिर कभी वहां नहीं आना पड़ता।

परिवार के सभी सदस्य अपने-अपने घर जा चुके थे। केवल तीन लोग बचे थे। गौरव, वैशाली और वैशाली की मां।

गौरव घर में अकेला रहता था। माता-पिता और भाई अभी भी गांव में रहते थे। 

वैशाली और गौरव का इकलौता बेटा, जो सिर्फ 5 साल का है, अदालत के फैसले के अनुसार 18 साल की उम्र तक वह वैशाली के साथ ही रहेगा। गौरव उससे महीने में एक बार ही मिल सकता था।

वैशाली ने जैसे ही घर में प्रवेश किया, पुरानी यादें ताजा हो गईं, उसने इस घर को कितनी मेहनत से सजाया था। इस घर की हर चीज उसके दिल से जुड़ी थी। सब कुछ उसकी आंखों के सामने बना था। उसने एक एक ईंट से पूरे घर को, धीरे-धीरे बनकर तैयार होते देखा था। वह उसका सपनों का घर था। गौरव ने कितनी लगन से उसका सपना पूरा किया था।

गौरव थक कर सोफ़े पर आकर बैठ गया और वैशाली से कहा, “जो चाहो ले लो, मैं तुम्हें नहीं रोकूंगा।” वैशाली ने अब गौरव को ध्यान से देखा। चार साल में कितना बदल गया था? बाल सफेद होने लगे थे। शरीर आधा रह गया था। चार साल में ही चेहरे की चमक फीकी पड़ गई थी।

वह उस स्टोररूम की ओर चल पड़ी, जहां उसका दहेज का अधिकांश सामान पड़ा था। चीजें पुराने जमाने की थीं, इसलिए उन्हें कबाड़ की तरह स्टोररूम में रख दिया गया था। उसे दहेज मिला ही कितना था? यह दोनों की लव मैरिज थी। मजबूरी में परिवार के लोगों को साथ आना पड़ा था।  उन्होंने लव मैरिज की थी, तभी तो किसी की नजर लग गई थी उनकी शादी को। क्योंकि हर कोई चाहता है कि प्रेमी जोड़ी टूट जाएं। एक बार, शराब पीने के बाद गौरव बहक गया था और गुस्से में वैशाली पर हाथ उठा दिया था। वैशाली भी आक्रोश में अपने घर चली गई थी। 

फिर न तो वैशाली वापस आई और न ही गौरव उसे लेने गया। इसके बाद लगाने – सिखाने का दौर आया। एक तरफ गौरव के भाई और उनकी पत्नी, तो दूसरी तरफ वैशाली की मां। मामला कोर्ट तक पहुंचा और तलाक हो गया। जिसका फ़ैसला आज हो चुका था और सब खत्म हो चुका था। 

वैशाली की माँ ने कहा “तुम्हारा सामान कहाँ है? यहाँ तो दिख नहीं रहा। इस शराबी ने इसे बेच तो नहीं दिया है?”

“चुप रहो माँ” वैशाली में अपनी माँ को थोड़ा गुस्से भरे लहज़े में कहा। वैशाली को पता नहीं क्यों गौरव को उसके चेहरे पर शराबी कहना अच्छा नहीं लगा। 

स्टोररूम में पड़े सभी सामानों को एक-एक करके इकठ्ठा किया गया और सूची के साथ मिलान किया गया। बाकी कमरों से भी दहेज का अन्य सामान उठा लिया गया। वैशाली ने सिर्फ अपना सामान लिया और गौरव का सामान छुआ तक नहीं।

वैशाली ने फिर गहनों से भरा बैग गौरव को सौंप दिया, लेकिन गौरव ने बैग वैशाली को वापस दे दिया। “रहने दो, मुझे नहीं चाहिए, रख लो, मुसीबत में काम आएंगे।”

गहनों की कीमत 20 लाख से कम नहीं थी।

“क्यों, आपका वकील तो बार-बार अदालत में गहने – गहने चिल्ला रहा था?” वैशाली ने कहा।

“अदालत की बात अदालत में ही खत्म हो चुकी है, वैशाली। वहां तो मुझे भी दुनिया का सबसे बुरा आदमी और शराबी साबित किया जा चुका है।” गौरव ने उत्तर दिया।

यह सुनकर वैशाली की मां नाक चढ़ाते हुए बाहर चली गई।

वैशाली ने भी गौरव से कहा, “मुझे भी 12 लाख नहीं चाहिए।”

 “क्यों?” इतना कहकर गौरव सोफे से उठ खड़ा हुआ।

“बस नहीं चाहिए” यह कहते हुए वैशाली ने मुँह फेर लिया।

“जिंदगी इतनी बड़ी है, कैसे गुजरेगी? ले लो, जरूरत में काम आएगा।” गौरव ने कहा।

इतना कहकर गौरव ने भी मुंह मोड़ लिया और दूसरे कमरे में चला गया। शायद उसकी आँखों में कुछ उमड़ रहा था, जिसे छुपाने की जरूरत थी।

बाहर वैशाली की मां कार चालक को फोन करने में व्यस्त थी।

वैशाली को मौका मिला और वह भी उसी कमरे में गौरव के पीछे चली गई।

गौरव अजीब सा चेहरा बना कर रो रहा था जैसे कि वह अंदर के तूफ़ान को दबाने की कोशिश कर रहा हो। वैशाली ने उसे कभी ऐसे रोते नहीं देखा था। आज जब वैशाली ने उसे पहली बार रोते हुए देखा तो पता नहीं क्यों उसके दिल को कुछ सुकून मिला।

लेकिन वो ज्यादा इमोशनल नहीं हुईं.

उसने गौरव से कहा, “अगर तुम्हें इतनी ही परवाह थी, तो तलाक क्यों दिया?”

“मैंने तुम्हें तलाक नहीं दिया,  बल्कि तुमने दिया।” गौरव ने कहा।

“क्या आप माफी नहीं मांग सकते?” वैशाली ने पूछा।

“तुम्हारे परिवार के सदस्यों ने मुझे कब मौका दिया। जब भी मैं फोन करता, फोन काट देते थे। “गौरव ने रूखे  लेकिन दयनीय लहज़े में ज़वाब दिया। 

“क्यों घर नहीं आ सकते थे”? वैशाली ने पूछा।

“”हिम्मत नहीं थी?” गौरव ने उत्तर दिया।

तभी वैशाली की मां कमरे में आई और उसका हाथ पकड़कर उसे बाहर ले गई। “अब क्यों उसके साथ बात कर रही हो? अब तो सब कुछ खत्म हो चुका हैं।”

मां-बेटी बाहर बरामदे में पड़े सोफ़े पर बैठ कर कार का इंतज़ार करने लगी। वैशाली के अंदर भी कुछ टूट रहा था, दिल बैठा जा रहा था और वह भी सुन्न सी बैठी थी। अचानक से उसकी नज़र उस सोफ़े पर पड़ी जिस पर वो बैठे थे। कैसे थोड़े – थोड़े पैसे बचाकर उसने और गौरव ने वह सोफा खरीदा था। पूरे शहर में घूमे थे, तब जाकर उसे अपनी पसंद का यह सोफा मिला था।”

तभी उसकी नजर सामने सूखे पड़े तुलसी के पौधे पर गई।  वह कितना ख्याल रखती थी इसका? तुलसी भी उसके साथ ही घर छोड़ कर चली गई।

घबराहट बढ़ने पर वह फिर उठी और कमरे के अंदर चली गई। मां पीछे से चिल्लाई लेकिन उसने अनसुना कर दिया। गौरव पलंग पर मुंह के बल लेटा हुआ था। एक बार तो उसे गौरव पर दया आई। लेकिन वह जानती थी कि अब सब कुछ खत्म हो गया है इसलिए उसे भावुक होने की जरूरत नहीं है।

उसने सरसरी निगाहों से कमरे की ओर देखा। पूरे कमरे की हालत खस्ता थी। कहीं कहीं तो मकड़ी के जाले लटक रहे हैं। उसे मकड़ी के जालों से कितनी नफरत थी?

फिर उसने चारों ओर उन तस्वीरों को ध्यान से देखा जिनमें वह गौरव के साथ गले लग कर मुस्कुरा रही थी।

कितने सुनहरे दिन थे वो।

उसी समय, वैशाली की माँ फिर से आ गई और उसका हाथ पकड़कर उसे बाहर ले गई।

कार बाहर आ चुकी थी और कार में सामान रखा जा रहा था। वैशाली गहरी सोच में बैठी थी। कार की आवाज सुनकर गौरव भी बाहर आ गया।

अचानक अपने कान पकड़कर गौरव घुटनों के बल बैठ गया।

कहा- “मत जाओ, मुझे माफ कर दो”

शायद यही वो शब्द थे जो वह चार साल से सुनना चाहती थी। सब्र के सारे बांध एक साथ टूट गए। वैशाली ने कोर्ट के फैसले का पेपर निकाल कर फाड़ दिया और उसकी मां के कुछ कहने से पहले ही वह गौरव से लिपट गई। दोनों एक साथ बुरी तरह रो रहे थे।

दूर खड़ी वैशाली की मां समझ गई कि दिलों के सामने कोर्ट का आदेश, कागज से ज्यादा कुछ नहीं है। उसने सोचा कि काश उसने उन्हें पहले मिलने दिया होता?

इस कहानी से आपको क्या शिक्षा मिलती है -:

अगर सिर्फ माफ़ी मांगने से ही रिश्ते को टूटने से बचाया जा सकता है तो आपको माफ़ी ज़रुर मांगनी चाहिए। 

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